मुख्य मुद्दा है साहित्य के मानकीकरण के पारदर्शी पक्ष का : प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

मुख्य मुद्दा है साहित्य के मानकीकरण के पारदर्शी पक्ष का : प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

खालसा न्यूज़डेस्क

लखनऊ: “इमर्जिंग ट्रेंड्स इन मॉडर्न इंडियन इंग्लिश लिटरेचर ” पर ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी दरभंगा के यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ़ इंग्लिश द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय इ कांफ्रेंस में “मॉडर्न इंडियन इंग्लिश लिटरेचर टेक्स्ट्स एंड रिसर्च ” विषय पर आमंत्रित वक्ता के रूप में बोलते हुए अपने प्लेनरी व्याख्यान में ये तर्क लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर ,रवीन्द्र प्रताप सिंह ने दिया ।

उन्होंने बताया कि भारतीय अंग्रेजी साहित्य आरम्भ तो दीन महमद के द ट्रेवल्स ऑफ़ दीन महमद (1793/94) के साथ ही प्रारम्भ हो गया था , इसे हम सुविधानुसार चार भागों में विभक्त कर सकते हैं , 1793 से 1930 का काल , 1930 से 1980 का काल , 1980 से 2010 का काल और 2010 से वर्तमान समय तक का भाग। दूसरे भाग 1930 से 1980 को हम पुनः दो भागों में रख कर देख सकते हैं , 1930 से 1960 तक का कालखंड जहाँ समाज मुख्य विषय था , और 1960 के बाद का ,जहाँ संस्कृति मुख्य विषय रूप में दृष्टव्य है ।

आर पी सिंह ने बताया कि वर्तमान समय के अंग्रेजी साहित्य में विषयवस्तु , शैली और इसके सौंदर्यशात्र को लेकर बड़ी उहापोह की स्थिति है। सबसे बड़ा प्रश्न है कैनन निर्माण का , यानि साहित्य के मानकीकरण के पारदर्शी पक्ष का, मानक कौन बनाता है , साहित्य के निर्माण एवं मानकीकरण में प्रकाशकों और मीडिया की भूमिका , लेखकों की पृष्ठभूमि और उनकी स्थिति भी कहीं न कहीं साहित्य के मानकीकरण को प्रेरित करती है। उन्होंने युरोसेंट्रिक अन्थोलॉजीज़ और साहित्य के मानकीकरण का मुद्दा भी उठाया। भारतीय अंग्रेजी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने इनसाइडर बनाम आउटसाइडर , सुपीरिऑरिटी बनाम इंफीरियरिटी , प्रोडक्टिव बनाम रिसेप्टिव , टेक्स्ट एज़ थॉट बनाम टेक्स्ट एज़ कमोडिटी ,क्रिटिकल बनाम एक्रिटिकल , एमिटेटिव बनाम क्रिएटिव जैसे डिबेट भी इंगित किये। उन्होंने कहा कि साहित्य संस्कृति के साथ नए समीकरणों का निर्माण करता है। प्रोफेसर सिंह ने विभिन्न साहित्यिक पाठों , शैलियों एवं रूपकों का विश्लेषण करते हुए इसे विस्तार प्रदान किया।उन्होंने भारतीय अंग्रेजी साहित्य के उदय एवं विस्तार की चर्चा करते हुए इसके सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के मूल में देश काल एवं परिस्थितियों की विभिन्न रूपों एवं पक्षों की भी चर्चा की।

प्रोफेसर सिंह ने ये भी बताया की मीडिया किस प्रकार साहित्यिक संस्कृति का निर्माण करती है। भारतीय साहित्य पर समुदाय , विचारधारा , अर्थव्यवस्था , मनःस्थिति के प्रभाव विभिन्न रूपों में दिखाई दे रहे हैं। सृजन के मूल केन्द्रक में मनुष्य चारों ओर फैले सामाजिक दबाव , व्यवहारवादी प्रकरणों धर्म एवं संस्कृति से लेकर मैत्री , प्रेम एवं अन्य व्यव्हार एवं तत्सम्बन्धी समीकरणों से भी प्रभावित है। भारतीय अंग्रेजी साहित्य बाजार, संस्था एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा भी उत्पादित होता रहा हैं और आत्मचेतना द्वारा भी विकसित। प्रोफेसर सिंह जो स्वयं साहित्यकार हैं ने नवोदित लेखकों को ‘ फ्रीडम’ का सूत्र दिया। अंग्रेजी शब्द फ्रीडम में आये अंग्रज़ी अक्षरों F R E E D O M को उन्होंने फीलिंग , रीराइटिंग ,एसेंस , एनर्जी , डोमेस्टिक , ऊव्र् , माइट , यानी संवेदना , पुनर्लेखन ,सुगन्धि , ऊर्जा , स्वदेशी, सर्वत्र यश, क्षमता और शक्ति की अभिव्यंजना द्वारा समझाया।

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