अपनी प्रेमपात्रा को न देख पाने की बेचैनी साफ देखी जा सकती थी

 

खालसा न्यूज़

उस साल गर्मियों में एक इंटरव्यू के सिलसिले में इलाहाबाद (प्रयागराज) जाना हुआ था. लखनऊ के एक सहपाठी इलाहबाद में मेरे होस्ट थे.उन दिनों वे अपनी एक सहपाठी पर मर मिटे थे जिसके पिता विश्वविद्यालय में ही अंग्रेजी विभाग में प्रोफेसर थे. गर्मी की छुट्टियों के चलते इधर वे शौक ए दीदार और नज़र पैदा करने के बावजूद वे प्रेम पात्रा के दीदार से वंचित थे. इलाहबाद में मेरे दाखिल होते ही वे मुझे प्रोफेसर कुशवाहा के सुयोग्य शिष्य और उक्त प्रोफेसर साहब के प्रबल प्रशंसक के रूप में मिलवाने और पर वास्तव में अपनी प्रेम पात्रा से मिलने पर आमादा थे.

इंटरव्यू कि औपचारिकता खत्म होने के बाद अगले दिन मित्र ने प्रोफेसर साहब से मिलने का वक्त लिया.निश्चित समय के घंटों पहले वे प्रोफेसर साहब की गली में सशरीर उपस्थित हो लिए, आत्मा तो पहले ही वही थी. तयशुदा वक्त पर हम प्रोफेसर साहब की कोठी में दाखिल हुए. प्रोफेसर साहब एक जंग लगे कुंडे से टंगे झूले पर झूला झूल रहे थे. मुझे आशंका थी झूला टूट सकता है.पर मेरी आशंका को धता बताते हुए वह एक चमत्कार की तरह वह न सिर्फ वह टंगा रह गया बल्कि उस पर झूला भी जाता गया. सामने बेंत की दो कुर्सियां पड़ी थीं. मित्रवर ने झूलते गुरूजी जी का जिस श्रद्धा और सावधानी से पैर छुवा वह मेरे लिए श्रद्धा का विषय हो सकता था पर ऐसा करना मेरे बूते की बात नहीं थी लिहाज़ा मैंने झूला थमने का इंतज़ार किया. भीतर से दिलवर दिलवर टाइप के गाने बज रहे थे. अंदर से बेचैन किन्तु ऊपर से सहज लग रहे मेरे मित्र ने प्रोफेसर साहब को बताया कि मैं उनकी भोजपुरी कविताओं का अन्यतम प्रशंसक हूं और यह भी कि मैं उनकी भोजपुरी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करके उसी पर पी एच डी करने पर आमादा हूँ. प्रोफेसर साहब इस बात पर जितना चकित थे उतना ही मैं भी था क्योंकि यह बात खुद मुझे अभी अभी पता चली थी कि मैं भोजपुरी की कविताओं का अनुवाद करने पर आमादा हूं.

प्रोफेसर साहब मेरी शक्ल देखकर ही इस बात से खासे मुतमईन थे कि वैसे तो यह महान काम मेरे वश का नहीं था लेकिन प्रोफेसर साहब को प्रोफेसर कुशवाहा पर यकीन था कि वे यह ऐतिहासिक काम मुझसे करा सकेंगे क्योंकि वे शोध के मामले में समझौता नहीं करते थे.उनकी राय थी कि टी एस एलियट की बहुचर्चित कृति द बेस्ट लैंड का उनके भोजपुरी अनुवाद “बंजर भुइं”का फिर से अंग्रेजी में अनुवाद होना अकादमिक दुनिया के लिए हैरतअंगेज अनुभव होगा. पी एच डी कर रहा आदमी बहुत धैर्यवान होता है लिहाज़ा वह ऐसी बातें जिसे सुनकर कमजोर गिजा का आदमी मारपीट कर सकता है होंठों के एक कोने से मुस्कुरा सकता है.जिसे दुनिया के किसी यन्त्र से देखा नहीं जा सकता है.
मित्रवर के चेहरे पर अपनी प्रेमपात्रा को न देख पाने की बेचैनी साफ देखी जा सकती थी. लेकिन जैसा कि शास्त्रों में कहा गया है मछेरे, प्रेमी और गदहे का धैर्य ही धन होता है उसी के अनुसरण में मित्रवर न सिर्फ बैठे रहे वरन समानुपातिक रूप से मुंडी हिलहिलाकर अनुमोदन कर रहे थे. जैसा कि दस्तूर है मित्रवर ने प्रोफेसर साहब को चापलूसी के नये मुकाम पर ले गए और फ़रमाया कि हमारा और इस दरिद्र देश का दुर्भाग्य है कि सर गँवार लौंडों को साहित्य पढ़ा रहे हैं.यूरोप में होते सर तो देरिदा के टक्कर के विखंडनवादी होते(सर ने प्रतिवाद किया अब नहीं पढ़ा रहे हैं इस जुलाई में 5 साल हो जायेंगे मैं क्लास में नहीं गया हूं)फिर सर उन्होंने सब स्टैण्डर्ड बच्चों के स्टैंडर्ड के और सब होते जाने का रोना रोया.फिर अपने उस विशेषाधिकार का उपयोग किया जिसके तहत एक प्रोफेसर को प्रोफेसर होना छोड़कर दार्शनिक, चिंतक, कवि, प्रशासक, शीयर, संत कुछ भी होने की सहूलियत होती है. पहले झूले की दोलन गति कम हुई, दाँत खोदने के तिनके को उखाड़ फेंका, एक सुदीर्घ जमुहाई ली, जमुहाई इतनी लम्बी और खुली थी कि मुझे समूचे अंग्रेजी साहित्य का दर्शन हो गया.अंदर अंग्रेजी के तमाम लेखक चिंतक कैद में इधर उधर बेचैन होकर भाग रहे थे.मैं जमुहाई के ख़त्म होने की उम्मीद छोड़ने ही वाला था कि एक चुटकी बजी,हरिओम की आवाज़ आई और जमुहाई के एक सुनहरे दौर पर पर्दा खिंच गया.अब वे तरो ताज़ा हो गए थे.मित्रवर “सर दीदी नहीं दिख रही हैं!”कहकर दिलवर दिलवर की दिशा में चले गए. इधर मैं दीदी और प्रेमपात्रा की चूल बिठाने की कोशिश कर ही रहा था कि सर ने मेरी चूलें उखाड़ दीं. पी एच डी पीड़ित होने के बावजूद उस वक्त मेरी हंसी छूट गयी ज़ब ज़ब सर ने किसी खास सिद्धांत पर चर्चा करते गांधीजी लोहिया को उद्दृत करते हुए खुद को भी उसी सांस में ऐसे उद्धृत किया जैसे वे कोई थर्ड परसन हों.

मेरे हँसने से सर उखड़ गए थे और माफ़ी मांगने के बावजूद वे असहज थे. शाम के साथ ही हमारे बीच सन्नाटा उतर रहा था.वे नये सिरे से मुझे घूर रहे थे और मैं ताम्बई आसमान देख रहा था. मित्रवर ज़ब खुद दीदी के साथ पानी लेकर आये तो असहज चुप्पी से भांप गए कि मामला क्या है. मामले को सँभालने की गरज़ से बोले सर कुछ कुंठित लोग होते हैं जो दूसरों की महानता स्वीकार नहीं कर पाते ये महाशय उन्हीं लोगों में से एक होंगे.मैंने स्वीकारा कि मुझे यह दिक्क़त है और नये सिरे से माफी मांगी. मामला रफा दफा हो गया.

बाहर आने के बाद काफी देर तक हम चुपचाप चलते रहे. मैंने मनाने की गरज़ से दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर जानना चाहा कि वहाँ दीदी कौन है? दोस्त फिर उखड़ गए बोले तुम साले कुंठित ही नहीं बीमार भी हो.. लेकिन मैंने दोस्त का ध्यान इस विडंबना की ओर दिलाना चाहा कि आप अपनी प्रेमपात्रा को दीदी कैसे बोल सकते हैं. दोस्त ने कंधे से मेरा हाथ झटक दिया और बोले दीदी रिश्ता नहीं प्रॉपर नाउन है तुम यहाँ मेरे कौन्सियस कीपर लगे हो. मैं बाज नहीं आया. लेकिन यह तो अनैतिक है.. मित्रवर ने तेलियरगंज के लिए ऑटो लेते हुए दो स्थापनाएं कि प्रेम का असली सौंदर्य अनैतिकता में निहित है. जो नैतिक है वह प्रेम नहीं प्रेम की सुविधा है. दूसरे यह कि तुम अपना झोला उठाओ और लखनऊ की ट्रेन पर लदो और इलाहाबाद की धरती हलकी करो.
शाम को मैं रात भर चलने वाली लखनऊ पैसेंजर पर कन्फुजियाया बैठा रहा मैं कौन हूं…

शंखधर दुबे

(यह लेखक के निजी विचार हैं, लेखक राज्यसभा ​सचिवालय में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत हैं)

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