यूँ ही कोई ‘राजनारायण’ नहीं हो जाता!

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 'हिन्दू' शब्द हटाने की माँग आजीवन करते रहे

 

1917 में बनारस के मोतीकोट में पैदा हुए, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से शिक्षा ली, स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात कुल मिलाकर 80 से ऊपर जेल यात्राएँ की (महात्मा गांधी से भी अधिक)। लोहिया के शिष्य और विश्वासपात्र तथा खाँटी समाजवादी थे। इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ 1971 में रायबरेली से चुनाव लड़ा और हारे, लेकिन चुनाव में अवैध तरीकों एवं भ्रष्टाचार को लेकर इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ केस किया और जीते। इंदिरा गांधी को 6 वर्षों के लिए चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया। माना जाता है कि इसी कारण इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगाया और सबसे पहले राजनारायण की गिरफ़्तारी हुई।
ख़ैर, एक व्यापक आंदोलन के बाद आपातकाल हटा और 1977 में फ़िर राजनारायण ने इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा और उन्हीं के गढ़ ‘रायबरेली’ में उन्हें हराया। तो ये हैं बाग़ी ‘राजनारायण’। शिक्षा: एम.ए. और एलएल.बी.। इनके बारे में कहा जाता था―
“He has the heart of a Lion and practices of Gandhi.”
डॉ.लोहिया ने कहा था कि राजनारायण जैसे सत्याग्रही अगर इस देश में रहें तो कोई हमारे लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता। राजनारायण बनारस राजघराने ( Narayan Dynasty ) से सीधे तौर पर सम्बद्ध थे लेकिन आजीवन अपना उपनाम ‘सिंह’ अपने नाम के आगे नहीं लगाया। काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए लड़ाई लड़ी, लाठियाँ खाईं, घसीटे गए और अंततः कामयाब हुए।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ‘हिन्दू’ शब्द हटाने की माँग आजीवन करते रहे। एक और सुना हुआ मज़ेदार वाकया है कि जब इनकी बेटी की शादी हो रही थी और कन्यादान के लिए इन्हें खोजा गया तो पता चला कि ये किसी बस्ती में भाषण दे रहे थे और उन्हें अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे।
जनता सरकार में स्वास्थ्य मंत्री का पद मिला तो कई क्रांतिकारी बदलाव लाये। लेकिन जनता पार्टी में आरएसएस और जनसंघ की भागीदारी की ख़िलाफ़त की, और जब इनकी बात नहीं सुनी गई तो इस्तीफ़ा देकर नई पार्टी जनता (एस) यानी जनता पार्टी(सेक्युलर) बनाई।
राजनारायण, चौधरी चरण सिंह को ‘राम’ और खुद को उनका ‘हनुमान’ कहते थे। लेकिन जनता पार्टी से अलग होने के बाद और मतभेदों के कारण 1984 में उनके ख़िलाफ़ बागपत से चुनाव लड़ा और कहा कि उनके राम अब ‘रावण’ में तब्दील हो गए हैं, अतः उन्हें पराजित करना होगा। हालांकि राजनारायण इस चुनाव में हार गए।
‘लोकबंधु’ नाम से विख्यात राजनारायण ने वर्ष 1986 के अंतिम दिन यानी 31 दिसम्बर को उनहत्तर वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
इस अल्हड़, फ़कीर और बाग़ी नेता को नमन!

~आयुष चतुर्वेदी

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