अगर आप कट्टर हों तब भी सिर्फ़ एक बार भूल जाएं कि फ़िरोज़ ख़ान मुसलमान हैं

बीएचयू के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर फ़िरोज़ ख़ान पर अब भी बहस ज़ारी है

खालसा न्यूज़

बीएचयू के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर फ़िरोज़ ख़ान पर अब भी बहस ज़ारी है। अब एएमयू के विद्यार्थियों ने उन्हें सपोर्ट किया है। मामला अब शिक्षा का रहा ही नहीं धर्म का बन गया है। उस धर्म को कुछ हो न जाए इसलिए हल्दी और तेल की जगह संस्कृति व सभ्यता घोलकर उसे धूप में डाला जा रहा है।

अगर आप कट्टर हों तब भी सिर्फ़ एक बार भूल जाएं कि फ़िरोज़ ख़ान मुसलमान हैं (क्योंकि इसे भूले बिना आप आगे सोच ही कहां पाते हैं)। सोचें कि इस समय जब कोई साहित्य व भाषाओं की शिक्षा में रुचि नहीं ले रहा है, वह व्यक्ति जिसके लिए आप मानते हैं कि उन्हें संस्कृत में दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए, इस भाषा में पारंगत होकर इसमें अपने जीवन की कल्पना कर पा रहा है। अगर आप संस्कृति व संस्कृत भाषा के रक्षक हैं तो आपको तो इस कृत्य की सराहना करनी चाहिए थी।

फिलहाल भूल जाएं कि 42वें संशोधन में हमारे प्रिएम्बल में ‘सेक्युलर’ शब्द जोड़ा गया। लेकिन आप ही तो कहते हैं न कि संस्कृत प्राचीनतम भाषा है और दर्जनों भाषाओं की जननी है जो अपनी अस्मिता खो रही है! फिर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसपर (आपके अनुसार) इस भाषा के प्रसार का कार्यभार न सौंपा गया हो, इस भाषा में दिलचस्पी ले रहा है, यह आपके लिए हर्ष का विषय क्यों नहीं है?

अब याद करें कि वह व्यक्ति फ़िरोज़ ख़ान हैं। वे उस कौम से ताल्लुक रखते हैं जिनसे आप ‘अपनी’ भाषा के लिए कुछ भी अच्छे या बुरे की उम्मीद नहीं रखते। वह व्यक्ति आपकी भाषा को आगे बढ़ा रहा है तो क्या उनका स्वागत नहीं किया जाना चाहिए!

आपको क्या लगता है, फ़िरोज़ ख़ान के पास पढ़ने-लिखने को, रोज़ी-रोटी के लिए विषयों की इतनी कमी रही होगी जिससे उन्होंने यह भाषा चुनी? उन्हें आभास नहीं होगा कि रास्ता मुश्किल है? उनके घरवालों ने, स्वजनों ने नहीं सवाल उठाये होंगे कि इस भाषा को पढ़कर क्या कर लोगे, कितना स्कोप है? उनके लिए फ़ारसी, जर्मन, रशन, फ़्रेंच की क्लासेज़ में ताला लग गया होगा क्या?

नहीं! फिर भी उन्होंने संस्कृत को चुना और इसलिए आप उनका बहिष्कार कर रहे हैं। बीएचयू, जो कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, वहां के विद्यार्थी इसमें धर्म के अतिरिक्त कुछ नहीं देख सके। आपको अपनी शैक्षणिक व्यवस्था, पद्धति, मानसिकता पर तरस नहीं आता?

अब सोचें कि अगर तमाम विरोध के बावजूद फ़िरोज़ ख़ान नहीं हटाये जाते हैं तो क्या होगा। वहां के छात्र उनकी क्लास में जायेंगे ही नहीं। प्रोफ़ेसर प्रतिदिन खाली क्लास को पढ़ाकर जाते रहेंगे। स्टाफ़ रूम में उनके प्रति रवैया ज़रा अलग रहेगा, परीक्षाओं तक उनका पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो सकेगा, बच्चे उन्हें गाहे-बगाहे तिरस्कृत करते रहेंगे और यह सब समेटे वे हर रोज़ घर जाते रहेंगे। उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति अभी क्या होगी, वे कैसे हर रोज़ अपनी क्लास में जाने की हिम्मत जुटा पाते होंगे! उफ़्फ़!

उस व्यक्ति की जगह एक बार ख़ुद को रखकर देखें जो पढ़ाने के लिए उत्साहित है लेकिन उसके धर्म ने उसकी दीक्षा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है क्योंकि वे बच्चे जो भारतवर्ष का ‘सुनहरा भविष्य’ लिखेंगे, उस विश्वविद्यालय में जहां शिक्षा ही धर्म है, एक दूसरे ‘धर्म’ पर अड़े हुए हैं। आपको क्या लगता है, ये बच्चे हमारा कल हैं? हैं तो फिर कल कुछ ज़्यादा ही धुंधला नहीं है?

पत्रकार रीवा सिंह की फेसबुक वाल से

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